top of page
खोज करे

मिदनापुर का मत्स्यपुराण

लेखक: कल्लोल

गर्मी की छुट्टी का मतलब हमारे लिए तीन चीज़ें होता था—आम-कटहल, दोपहर में लूडो, और मोहल्ले के मोड़ पर खड़े होकर दुनिया बदलने की योजना बनाना। हम चार थे—मैं पटला हमारा स्वयंभू नेता भोंदा बनर्जी, चश्माधारी तर्क-यंत्र टिनटिन, और हमेशा भूख से पीड़ित काबुल

उस साल भोंदा ने घोषणा की, “देख पटला मनुष्य को प्रकृति की ओर लौटना ही पड़ेगा। कलकत्ता की फुचका, ट्राम और टेलीविज़न ने आदमी को कमजोर बना दिया है। हम मछली पकड़ना सीखेंगे। फिर एक दिन गंगा किनारे अंतरराष्ट्रीय मत्स्य सम्मेलन करेंगे।”

मैंने कहा, “पहले तू बाल्टी में मछली पकड़ना सीख ले।”

भोंदा ने आंखें तरेरीं। “चुप रह। इतिहास में महान लोगों का पहले मज़ाक उड़ाया जाता है। बाद में उन्हीं की मूर्तियां बनती हैं।”

हमारा गंतव्य था मिदनापुर का एक गांव—बटतला-गोपालपुर। नाम सुनते ही काबुल बोला, “बटतला है तो छाया होगी। गोपालपुर है तो दूध होगा। और मिदनापुर है तो मिठाई भी होगी।”

टिनटिन ने चश्मा पोंछते हुए कहा, “मिदनापुर में मिठाई से अधिक कांथी, पोटाशपुर, दीघा, खेजुरी, खेत और नदी प्रसिद्ध हैं।”

काबुल ने गंभीर होकर पूछा, “तो मिठाई नहीं?”

टिनटिन बोला, “हो भी सकती है।”

काबुल ने राहत की सांस ली। “चलो, सभ्यता बची हुई है।”

हम हावड़ा से ट्रेन पर चढ़े। भोंदा अपने साथ एक मोटी कॉपी लाया था। उसके पहले पन्ने पर लिखा था—मछली और मनुष्य का संबंध: एक क्रांतिकारी अध्ययन।

मैंने नीचे लिख दिया—लेखक अभी तक सिर्फ मछली की कांटा-व्यवस्था से परिचित है।

ट्रेन जब शहर छोड़कर खेतों की ओर बढ़ी, भोंदा की आत्मा अचानक ग्रामीण हो उठी। खिड़की से बाहर देखकर बोला, “वह देखो, हरित क्रांति!”

टिनटिन ने कहा, “वह धान नहीं, पटसन का खेत है।”

भोंदा तनिक रुका, फिर बोला, “हरा तो है? बस। क्रांति मौजूद है।”

स्टेशन पर हमें लेने आए थे गांव के शिक्षक बिरिंची बाबू। वे भोंदा के पिसेमशाई के मित्र के ममेरे भाई के दामाद के पड़ोसी थे। रिश्ता इतना कठिन था कि टिनटिन ने तुरंत कागज़ पर वंश-वृक्ष बनाना शुरू कर दिया।

बिरिंची बाबू बोले, “आओ-आओ, कोलकाता के पोला-पान सब आ गए? गर्मी में कष्ट होबे, लेकिन माटी की हवा बहुत भालो।”

भोंदा ने हाथ जोड़कर कहा, “हम ग्रामीण जीवन से एकात्म होने आए हैं।”

बिरिंची बाबू हंसे। “पहिले गमछा से पसीना पोंछो, फिर एकात्म होना।”

गांव में घुसते ही हमारा शहरी आत्मविश्वास पापड़ की तरह सिकुड़ गया। चारों ओर तालाब, आम के पेड़, ताड़, मिट्टी की सड़क, आंगन में बत्तख, बकरी, मुर्गी और दूर नदी का बालू-चर। काबुल ने एक बत्तख देखकर पूछा, “ये सरकारी बत्तख है क्या?”

मैंने कहा, “बत्तख भी सरकारी होती है?”

काबुल बोला, “कलकत्ता में हर चीज़ का यूनियन है। बत्तखों का भी हो सकता है।”

दोपहर में भात, दाल, पोस्तो, आलू-भाजा, कच्चे आम की चटनी और तालाब की मछली का झोल खाकर काबुल ने आंख बंद कर कहा, “मैं यहीं बसूंगा। तुम लोग कलकत्ता जाकर मेरी स्मृति सभा कर देना।”

बिरिंची बाबू बोले, “कल भोर में तुम्हें हरिपद जेला के घर ले जाऊंगा। वही मछली पकड़ना सिखाएगा।”

भोंदा ने कॉपी में लिखा—प्रथम दिवस: मत्स्यजीवी समुदाय से प्रारंभिक संपर्क।

मैंने बगल में लिखा—प्रथम दिवस: काबुल ने तीन बार भात लिया।

अगली सुबह काक की आवाज़, गाय की घंटी और भोंदा की गर्जना से नींद खुली—“उठो! आज इतिहास बनेगा!”

काबुल ने चादर के भीतर से कहा, “इतिहास आठ बजे के बाद नहीं बन सकता क्या?”

भोंदा बोला, “मछलियां सुबह उठती हैं।”

टिनटिन बोला, “सभी मछलियां नहीं। कुछ निशाचर भी होती हैं।”

भोंदा ने कहा, “तू मछलियों के निजी जीवन में इतना क्यों घुसा हुआ है?”

हम गमछा, पुरानी पैंट और बांस की छड़ी लेकर हरिपद काका के घर पहुंचे। हरिपद काका लंबे, काले, दुबले आदमी थे, जिनकी आंखों में खूब हंसी थी। उनकी पत्नी फूलश्वरी काकी ने हमें देखकर कहा,“अरे, कोलकाता के बाबू लोग माछ धरते आइछो? पहिले तालाब में उतरोगे, ना फोटो खिंचाओगे?”

भोंदा ने कहा, “हम मैदानी अनुभव लेने आए हैं।”

काकी हंस पड़ीं। “अरे हरिपद, ये लोग तो बात से माछ धरेगा।”

हरिपद काका बोले, “देखो बाबू, माछ पकड़ना है तो पहिले चुप रहना सीखो।”

यह सुनकर मैं, टिनटिन और काबुल एक साथ भोंदा की ओर देखने लगे। भोंदा बोला, “तुम लोग मुझे शक की निगाह से देख रहे हो?”

मैंने कहा, “नहीं। हम मछलियों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं।”

पहला पाठ था जाल फेंकना। हरिपद काका ने गोल जाल कंधे से उठाया और ऐसा फेंका कि वह हवा में फूल की तरह खुलकर तालाब पर गिरा। भोंदा ने तालियां बजाईं। “एक्सेलेंट! अब मैं।”

हरिपद काका ने कहा, “धीरे बाबू। पहिले ठीक से खड़ा हो।”

भोंदा जाल लेकर खड़ा हुआ। चेहरा ऐसा जैसे प्लासी के युद्ध से पहले सेनापति। वह बोला, “मछली समाज, सावधान!”

फिर उसने जाल फेंका।

जाल तालाब में नहीं गिरा।जाल जाकर आम के पेड़ पर अटक गया।

हम तीनों धरती पर बैठकर हंसने लगे। पेड़ पर जाल लटक रहा था और उसमें एक कौआ बैठकर कांव-कांव कर रहा था।

फूलश्वरी काकी दूर से चिल्लाईं, “बाबू, माछ पेड़ पर चढ़ गया नाकी?”

भोंदा ने लाल चेहरा बनाकर कहा, “मैं हवा की दिशा माप रहा था।”

टिनटिन बोला, “हवा की नहीं, तेरी बुद्धि की दिशा पकड़ी गई है।”

इसके बाद छड़ी से मछली पकड़ने की बारी आई। कांटे में केंचुआ लगाया गया। काबुल केंचुए को देखकर पीछे हट गया।

“ये जीवित है?”

हरिपद काका बोले, “हां रे बाबू।”

काबुल बोला, “तो मछली को खिलाने से पहले इसकी अनुमति लेनी चाहिए।”

भोंदा गरजा, “यही है कलकत्ता की अधिक शिक्षा का दुष्परिणाम—केंचुए का लोकतंत्र!”

आखिर फूलश्वरी काकी ने ही टोप लगा दिया। हम चारों तालाब किनारे बैठे। पांच मिनट। दस मिनट। पंद्रह मिनट। मछली नहीं।

काबुल फुसफुसाया, “मछलियों ने हमारा बहिष्कार कर दिया क्या?”

भोंदा बोला, “चुप। मछली पकड़ना ध्यान है।”

तभी भोंदा की छड़ी कांपी। वह चिल्लाया, “मिल गई! विशाल! रोहू! कतला! शायद मगरमच्छ!”

वह पूरी ताकत से खींचने लगा। हम सब उत्तेजित। थोड़ी देर बाद पानी से निकला—एक पुराना गमछा।

मैंने कहा, “वाह! वस्त्र-मछली!”

टिनटिन बोला, “स्थानीय जलाशय की कपड़ा-सम्पदा।”

हरिपद काका बोले, “ना बाबू, वह मेरा ही गमछा है। पिछले हफ्ते गिर गया था।”

फिर काबुल की छड़ी हिली। काबुल डरकर छड़ी छोड़ बैठा। छड़ी तालाब में बह चली।

हरिपद काका बोले, “अरे, मछली खींच रही है!”

काबुल ने कांपते हुए कहा, “तो मछली ही रख ले। उसे ज़्यादा ज़रूरत होगी।”

काकी बोलीं, “अरे बाबा, कोलकाता का छोरा माछ धरने आकर माछ को दान कर रहा है!”

फिर हमें खाल की ओर ले जाया गया। वहां एक छोटी नाव थी। भोंदा ने तुरंत कहा, “नाव की कमान मैं संभालूंगा।”

मैंने कहा, “तू चढ़ेगा तो नाव ही कमान छोड़ देगी।”

फिर भी वह चढ़ा। फिर मैं, टिनटिन और काबुल। नाव डोलते ही काबुल ने मेरा कंधा पकड़ लिया। “पटला अगर डूब गए तो मेरी लुची वाली यादों की रक्षा करना।”

हरिपद काका बोले, “डर नहीं। खाल गहरी नहीं है।”

भोंदा बोला, “हम कलकत्ता के लड़के हैं। ट्राम, बस, मेट्रो सब संभालते हैं। नाव क्या चीज़ है!”

उसी समय नाव हल्की-सी हिली। भोंदा “मां गो!” कहकर हरिपद काका से लिपट गया।

खाल के बीच में जाल डाला गया। तभी भोंदा के पांव के पास एक छोटी मछली उछली। भोंदा चिल्लाया, “सांप!”

उसने छलांग लगाई। नाव डगमगाई। मैं टिनटिन पर, टिनटिन काबुल पर, काबुल मछली पर, और भोंदा सीधा कीचड़ में।

किनारे से एक बूढ़े ने कहा, “कोलकाता बाबू मगरी माछ की तरह कीचड़ में खूब नाचे।”

एक छोटा लड़का बोला, “दादाभाई, एक बार और गिरिए ना!”

भोंदा बोला, “विज्ञान को मनोरंजन मत बनाओ।”

दोपहर तक भोंदा कीचड़, टिनटिन कंकड़े के भय, काबुल भूख और मैं हंसी से थक चुके थे। लेकिन असली परीक्षा शाम को थी—हाथजाल लेकर तालाब में उतरना।

कादा पांव में घुसते ही मैंने कहा, “ये कीचड़ हिल क्यों रहा है?”

हरिपद काका बोले, “कीचड़ नहीं, तुम्हारा पांव कांप रहा है।”

टिनटिन बोला, “सिल्टी क्ले सॉयल। हाई मॉइस्चर। लो स्टेबिलिटी।”

भोंदा बोला, “हिंदी में बोल।”

टिनटिन ने कहा, “कीचड़ है। फिसलेगा। गिरेगा।”

प्रमाण तुरंत मिला। भोंदा हाथजाल लेकर आगे बढ़ा, फिसला और धप्प से बैठ गया। उसके सिर पर शापला का पत्ता चिपक गया।

काबुल बोला, “देख पटला जलपरी नहीं, जलपरमेश्वर।”

फूलश्वरी काकी बोलीं, “बाबू, माथे पर पत्ता लगाकर साधु बने हो क्या?”

थोड़ी देर बाद टिनटिन को कंकड़े ने काट लिया। वह ऐसी छलांग लगा गया कि चश्मा तालाब में गिर पड़ा।

काबुल ने पांच मिनट बाद चश्मा निकाला। बोला, “मिल गया।”

टिनटिन ने राहत से कहा, “धन्यवाद।”

काबुल बोला, “लेकिन एक कंकड़ा इसे पहनकर बैठा है।”

अंततः हमारी मेहनत से निकले तीन पুঁटी, एक घोंघा, दो पत्ते और नारियल का खोल।

शाम तक पूरे गांव में खबर फैल गई कि कलकत्ता के चार लड़के मछली पकड़ने आए थे और पेड़, गमछा, कीचड़, कंकड़ा सब पकड़कर लौटे।

दूसरे दिन हरिपद काका ने कहा, “आज चांई लगाएंगे। माछ खुद अंदर आएगा।”

भोंदा प्रसन्न हुआ। “यही तो बौद्धिक पद्धति है। मछली खुद आएगी, हम नेतृत्व देंगे।”

एक घंटे बाद चांई उठाई गई। उसमें सचमुच कुछ पুঁटी और एक टेंगरा था।

काबुल खुशी से उछला। “हम जीत गए!”

भोंदा ने सीना फुलाकर कहा, “देखा? मेरे नेतृत्व में ग्रामीण मत्स्य क्रांति।”

हरिपद काका हंसकर बोले, “क्रांति चांई ने की है, तुमने नहीं।”

तभी टेंगरा उछलकर भोंदा के पांव के पास गिरा। भोंदा ने उसे सांप समझा, पीछे हटा, कलसी से टकराया, पानी फैल गया, और वह फिसलकर धुले चावल की हांडी पर जा बैठा।

फूलश्वरी काकी सिर पकड़कर बोलीं, “हाय दइया, भात से पहिले बाबू सिद्ध हो गया!”

दोपहर में उन्हीं मछलियों का झोल बना। मछली कुल आठ थीं, पर स्वाद ऐसा कि काबुल बोला, “ये आठ मछलियां मेरे जीवन के आठ अध्याय हैं।”

भोंदा ने कहा, “आज समझ में आया—मछली पकड़ना पेशा नहीं, दर्शन है।”

मैंने पूछा, “और कीचड़?”

भोंदा बोला, “जीवन की वास्तविकता।”

टिनटिन बोला, “और गमछा?”

“ऐतिहासिक दस्तावेज़।”

काबुल ने पूछा, “और भात?”

भोंदा बोला, “राष्ट्रीय संपत्ति।”

लौटते समय हरिपद काका बोले, “फिर आना। पर पहले चुप रहना सीखकर आना।”

फूलश्वरी काकी ने मुड़की देते हुए कहा, “कोलकाता जाकर कहना—मेदिनीपुर में माछ कम नहीं, मज़ा ज्यादा है।”

ट्रेन चली। खिड़की से खेत पीछे छूटने लगे। भोंदा ने कॉपी में आखिरी पंक्ति लिखी—मछली पकड़ना कठिन है। मछली खाना सरल है। पर गांव के लोग सबसे बड़ा पाठ हैं।

मैंने नीचे लिख दिया—और भोंदा के कारण अब मछलियां भी कलकत्ता से डरती हैं।

काबुल मुड़की खाते हुए बोला, “फिर चलेंगे न?”

टिनटिन बोला, “अगली बार खेती सीखने गए तो कद्दू हमारा पीछा कर सकता है।”

भोंदा खिड़की से बाहर देखते हुए बोला, “जाएंगे। मनुष्य को खेत में लौटना ही होगा।”

मैंने कहा, “पहले तुझे तालाब से लौटाना ही काफी है।”

और ट्रेन के डिब्बे में हम सब हंस पड़े। बाहर गर्मी की दोपहर थी, खेत थे, तालाब थे, और शायद कहीं मछलियों की सभा चल रही थी—“कलकत्ता के चार बाबू फिर आएं तो पानी में मत रहना। पेड़ पर चढ़ जाना।”

 
 
 

टिप्पणियां


रांची, कोलकाता और इंफाल में हमारे साथ जुड़ें

मोबाइल : ​ 8292385665;  मेल: info@dcdt.net

  • s-facebook
  • Twitter Metallic
  • s-linkedin
bottom of page