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रायबाड़ी की दुर्गापूजा में धुनुची नृत्य करते बड़े मामा और छोटे मामा

दुर्गापूजा

1 minute ago
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रचनाकार: कल्लोल साहा

हावड़ा ज़िले के जिस गाँव में हमारा मामाबाड़ी है, उसका नाम हरिनारायणपुर है। रेलवे की समय-सारिणी में उसका नाम नहीं मिलेगा। सरकारी नक्शे में वह इतने छोटे अक्षरों में लिखा है कि लगता है नक्शा बनाने वाले को भी उसके अस्तित्व पर पूरा भरोसा नहीं था। कोलकाता के रिश्तेदारों के लिए उसका परिचय बस इतना है—“वही, आमता की तरफ़ कहीं।” हरिनारायणपुर न पूरी तरह गाँव है, न पूरा शहर। सुबह खजूर के पेड़ों के पार लोकल ट्रेन की सीटी सुनाई देती है, शाम को तालाब के घाटों से शंख बजते हैं, और रात नौ बजे के बाद मोड़ की किसी दुकान पर कोई न कोई ऑनलाइन मोबाइल रिचार्ज कर रहा होता है। शायद बंगाल की स्वाभाविक अवस्था ही यह बीच की अवस्था है। हम आधुनिक हो गए हैं, लेकिन छाते का हैंडल टूट जाए तो आज भी हराधन-दा के पास ही जाते हैं।

हमारा मामाबाड़ी, रायबाड़ी, कभी एक पुराना प्रतिष्ठित बोनदी घर था। अब भी लोग उसे बोनदी बाड़ी कहते हैं, क्योंकि वहाँ एक ठाकुर-दालान है, चार बहुत बड़े खंभे हैं, ऊपर की बरामदे की लोहे की जाली को सब “अंग्रेज़ों के ज़माने की” कहते हैं, और परिवार का कोई भी सदस्य ठीक-ठीक नहीं बता सकता कि घर का कौन-सा हिस्सा किसका है। कहा जाता है कि हमारे किसी पुरखे ने ज़मींदारी की थी। बड़े मामा कहते हैं, “ज़मींदारी नहीं, शायद ज़मीन की दलाली करते थे। इतिहास ने पदोन्नति दे दी।” छोटे मामा इसका विरोध करते हैं। “परिवार की प्रतिष्ठा नाम की भी कोई चीज़ होती है।” बड़े मामा कहते हैं, “इसीलिए तो सच को बचा रहा हूँ।”

रायबाड़ी में दुर्गापूजा लगभग डेढ़ सौ साल से हो रही है। ठीक कितने साल से, इस पर भी परिवार में सहमति नहीं है। छोटे मामा के पास एक पुरानी कॉपी है जिसमें 1871 लिखा है। बड़े मामा के पास एक चाँदी की थाली है जिस पर 1864 खुदा है। एक दूर के काका का कहना है कि उनके परदादा के दादा के समय भी पूजा होती थी। बड़े मामा ने एक दिन विवाद समाप्त करते हुए कहा था, “जिस पूजा की उम्र को लेकर झगड़ा होने लगे, मान लो पूजा पर्याप्त पुरानी है।” छोटे मामा बोले थे, “ऐतिहासिक प्रमाण के प्रति इसी ढीले रवैये के कारण देश पीछे है।” बड़े मामा ने जवाब दिया था, “देश की दुर्दशा मेरे पूजा-रजिस्टर पर मत डालो।”

इस साल की पूजा की पहली बैठक भाद्र महीने के आख़िरी रविवार को हरिनारायणपुर मिलन संघ में हुई। साल भर क्लब के कमरे में कैरम खेला जाता है, बरसात में दो छाते सुखाए जाते हैं, चुनाव पर बहस होती है और वे सामान रखे जाते हैं जिन्हें कोई अपने घर नहीं ले जाना चाहता। पूजा के पहले वही कमरा अचानक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन-कक्ष बन जाता है। दीवार पर स्वामी विवेकानंद की तस्वीर है। उसके बगल में पिछले साल के क्रिकेट टूर्नामेंट की रनर्स-अप टीम की फ़्रेम की हुई तस्वीर। दोनों के नीचे एक बोर्ड—“धूम्रपान निषेध।” और ठीक उसी बोर्ड के नीचे क्लब के सचिव सिगरेट पी रहे थे।

छोटे मामा पाँच मिनट पहले पहुँच गए थे और मेज़ पर नीली फ़ाइल, लाल फ़ाइल और कैलकुलेटर सजा चुके थे। बड़े मामा दस मिनट देर से आए, हाथ में पुराना छाता। बाहर तेज़ धूप थी। छोटे मामा ने पूछा, “छाता क्यों?” बड़े मामा बोले, “बंगालियों की कमिटी मीटिंग है। सिर पर कब क्या बरस पड़े, कहा नहीं जा सकता।”

अध्यक्ष नित्यानंद बाबू ने गला साफ़ किया। “पहला विषय—बजट।” छोटे मामा ने तुरंत नीली फ़ाइल खोली। “पिछले साल कुल खर्च चार लाख इकतीस हज़ार सात सौ अड़सठ रुपये था।” बड़े मामा बोले, “अड़सठ रुपये का ब्यौरा चाहिए।” छोटे मामा ने सिर उठाया। “क्यों?” “चार लाख समझ में आता है। इकतीस हज़ार भी। सात सौ तक ठीक है। लेकिन अड़सठ रुपये बहुत रहस्यमय लगते हैं।” कोषाध्यक्ष बोले, “नारियल और माचिस।” बड़े मामा ने सिर हिलाया। “तो ठीक है। धार्मिक मद में गया।”

छोटे मामा ने घोषणा की, “इस साल अनुमानित बजट पाँच लाख दस हज़ार।” कमरे में एक साथ पाँच चेहरों की आकृति बदल गई। गोपाल काकू बोले, “इतना क्यों?” छोटे मामा ने कहा, “महँगाई।” बड़े मामा ने पूछा, “माँ दुर्गा की भी?” छोटे मामा ने जबड़ा कसा। “हर चीज़ महँगी हुई है।” “सिंह?” “दादा, प्लीज़।” “मैं गंभीर हूँ। पिछले साल एक सिंह था। इस साल भी एक होगा। वहाँ cost escalation क्यों?” क्लब में हँसी फूट पड़ी। छोटे मामा फ़ाइल पर कलम ठकठकाने लगे। “इस तरह चलेगा तो बैठक करना असंभव है।” बड़े मामा बोले, “यह सभ्यता की बड़ी प्रगति होगी।”

काम बाँटे गए। छोटे मामा को वित्त, खरीद, आपूर्ति, मेहमानों की व्यवस्था और रोशनी का काम मिला। बड़े मामा को पूजा-पद्धति की पुरानी परंपराएँ, भोग, सांस्कृतिक कार्यक्रम और “समग्र परामर्श।” आख़िरी दो शब्द किसने लिखे, किसी को पता नहीं। बड़े मामा ने पूछा, “समग्र परामर्श का मतलब?” नित्यानंद बाबू बोले, “हर विषय में आपकी राय रहेगी।” बड़े मामा खुश हो गए। “मतलब काम दूसरे करेंगे, टिप्पणी मैं करूँगा? बहुत बढ़िया पद है।”

अगला प्रश्न था पूजा की खरीदारी कहाँ होगी। छोटे मामा बोले, “कोलकाता में bulk purchase करने से खर्च कम होगा।” बड़े मामा बोले, “तुम्हारी ज़िंदगी में bulk में केवल सलाह मिलती है।” फिर भी तय हुआ कि एक दिन बड़ाबाज़ार, कॉलेज स्ट्रीट, हाथीबागान और गरियाहाट घूमकर माँ की साड़ी, पुरोहित का सामान, पुरस्कार, धुनो, दीपक, पीतल-काँसे के बर्तन, महिलाओं की साड़ियाँ और पुरुषों के पंजाबी खरीदे जाएँगे। गाँव से आठ लोगों के जाने की बात थी। पिछली शाम तक उन आठ लोगों के साथ उनकी पत्नियाँ, दो भांजियाँ, तीन बच्चे और एक पड़ोसी भी जुड़ गए। छोटे मामा सूची देखकर बोले, “यह खरीदारी की टीम है या बारोवारी पिकनिक?” बड़े मामा बोले, “बंगाल में बाज़ार जाने वालों की संख्या कभी स्थिर नहीं रहती। मिठाई की दुकान जैसी है—एक आदमी अंदर जाता है, छह बाहर निकलते हैं।”

सुबह 7:08 की लोकल पकड़नी थी। छोटे मामा साढ़े छह से स्टेशन पर थे। हम सात बजकर दस पर पहुँचे। बड़े मामा बारह मिनट पर आए। ट्रेन निकल चुकी थी। छोटे मामा के चेहरे से लग रहा था वे परिवार त्यागने वाले हैं। बड़े मामा बोले, “एक ट्रेन गई तो क्या हुआ? ज़िंदगी से कितने लोग चले गए, फिर भी हम खड़े हैं।” छोटे मामा बोले, “दर्शन बंद करो। अगली ट्रेन 8:05 की है।” बड़े मामा खुश होकर बोले, “बहुत अच्छा। दर्शन के लिए तिरपन मिनट।”

हावड़ा स्टेशन पहुँचकर छोटे मामा ने कड़ा आदेश दिया, “कोई समूह से अलग नहीं होगा।” यह कहने के आठ मिनट बाद बड़े मामा गायब। खोजते-खोजते प्लेटफ़ॉर्म के छोर पर मिले। चाय पी रहे थे और किसी अनजान बुज़ुर्ग के साथ ईस्ट बंगाल-मोहन बागान पर चर्चा कर रहे थे। छोटे मामा बोले, “हम सब तुम्हें खोज रहे हैं!” बड़े मामा बोले, “मुझे पता नहीं था। फ़ोन करना चाहिए था।” “फ़ोन तुम्हारी जेब में है!” “तुम लोगों के पास भी है।” छोटे मामा ने कुछ देर घूरकर कहा, “तुमसे बहस करने का कोई अर्थ नहीं।” बड़े मामा बोले, “यह जानने में तुम्हें साठ साल लग गए।”

बड़ाबाज़ार में सबसे पहले माँ दुर्गा की साड़ी लेने गए। दुकानदार एक के बाद एक लाल पाड़ की साड़ी निकालता गया। बड़े मामा चुप। छोटे मामा ने पूछा, “कौन-सी अच्छी है?” बड़े मामा बोले, “माँ दुर्गा पर सब अच्छी लगेगी।” “यह कोई राय नहीं।” “राय है। बस तुम्हारे उपयोग की नहीं।” फिर मझली मामी ने अपने लिए साड़ी देखनी शुरू कर दी। एक तसर उठाकर पूछा, “यह कैसी?” बड़े मामा बोले, “बहुत अच्छी।” दूसरी—“यह?” “शानदार।” तीसरी—“यह?” “असाधारण।” मामी ने आँखें सिकोड़कर पूछा, “तुम देख भी रहे हो?” बड़े मामा बोले, “मैंने पूरे लेन-देन की दार्शनिक संरचना समझ ली है।” “क्या?” “आख़िर में वही साड़ी खरीदी जाएगी जो तुम्हें पसंद है। मेरी राय केवल एक संवैधानिक रस्म है।” उन्हें तुरंत दुकान के बाहर भेज दिया गया। बाहर कचौड़ी खाकर लौटे और बोले, “सत्यवादी मनुष्य की अंतिम शरण भोजन है।”

कॉलेज स्ट्रीट में सांस्कृतिक कार्यक्रम के पुरस्कारों के लिए किताबें खरीदते हुए छोटे मामा ने अपना ही बजट तोड़ दिया। सूची में पंद्रह किताबें थीं, उन्होंने बत्तीस खरीदीं। बड़े मामा बिल देखकर बोले, “Financial discipline?” छोटे मामा ने कहा, “किताब पर खर्च अपव्यय नहीं।” बड़े मामा बोले, “अच्छा, सिद्धांतों के भी प्रिय पात्र होते हैं।” थोड़ी देर बाद बड़े मामा खुद एक पुरानी किताब की दुकान में गए और चार किताबें खरीद लाए। छोटे मामा ने पूछा, “और ये?” बड़े मामा बोले, “ये अपव्यय नहीं।” “क्यों?” “क्योंकि मैंने खरीदी हैं।”

गरियाहाट तक पहुँचते-पहुँचते पूजा की खरीदारी पारिवारिक आपदा बन चुकी थी। जूते की दुकान में बड़े मामा ने एक सैंडल पहनकर पाँच मिनट चक्कर लगाया। सेल्समैन ने पूछा, “Comfortable, sir?” बड़े मामा बोले, “जूता comfortable है या नहीं, यह जूते की राय है। मेरे पैर ने अभी फैसला नहीं किया।” छोटे मामा ने अपने लिए महँगा हैंडलूम पंजाबी खरीदा। दाम सुनकर बड़े मामा ने दुकानदार से पूछा, “इसके साथ पंजाब भी मिलेगा?” छोटे मामा बोले, “Handloom है।” बड़े मामा बोले, “हाथ से बुना है तो हाथ भी खरीदना पड़ेगा?” आख़िर में बड़े मामा ने फुटपाथ से साधारण सफ़ेद सूती पंजाबी खरीदा। छोटे मामा ने पूछा, “टिकेगा?” बड़े मामा बोले, “अगर मुझसे ज़्यादा टिक गया तो मेरा अपमान होगा।”

महालया की सुबह रायबाड़ी बदल गई। तीन अलग घरों से तीन थोड़ा अलग समय पर महिषासुरमर्दिनी बज रही थी। बड़े मामा बरामदे में चाय लेकर बैठे बोले, “देवीपक्ष भी अब surround sound हो गया।” तालाब के पास शिउली के फूल, खेतों पर हल्का कुहासा, बाँसों की चोटियों पर फीकी रोशनी। मैं उनके पास खड़ा था। बड़े मामा बोले, “गंध आ रही है?” मैंने कहा, “शिउली?” “नहीं।” “धुआँ?” “नहीं।” “तो?” “पूजा।” मैं हँसा। “पूजा की भी गंध होती है?” बड़े मामा बोले, “जिस चीज़ का इंतज़ार बचपन में किया जाता है, उम्र बढ़ने पर उसकी अपनी गंध बन जाती है।” तभी छोटे मामा कॉपी लेकर आए। “आज से काम शुरू। बिजली की वायरिंग, रसोई का तिरपाल, भोग का चावल—सब देखना होगा।” बड़े मामा बोले, “देवी अभी कैलाश से चली भी नहीं हैं और तुम stock verification शुरू कर चुके हो।”

महालया से पंचमी तक रायबाड़ी लंबी नींद से जागती रही। पुराने दरवाज़े खुले। ठाकुर-दालान का फ़र्श धुला। जाले हटे। पीतल के दीपक राख से माँजकर चमकाए गए। कई साल बाद रिश्तेदार लौटे—कोई बेंगलुरु से, कोई पुणे से, कोई दिल्ली से, कोई साल्ट लेक से। साल भर न मिलने वाले लोग पहले बोले, “बहुत मोटे हो गए हो!” और फिर गले लगे। बड़े मामा बोले, “बंगाली प्रेम की पहली अभिव्यक्ति शारीरिक ऑडिट है।” छोटे मामा बरामदे में खड़े कमरों का बँटवारा कर रहे थे। “वे तीन उत्तर वाले कमरे में। दीदीभाइयाँ ऊपर। अरूप और बच्चे लाइब्रेरी में।” बड़े मामा बोले, “लोगों को लाइब्रेरी में रखोगे?” छोटे मामा बोले, “अब किताबें कोई पढ़ता नहीं। जगह है।” बड़े मामा बोले, “सभ्यता के पतन के इतने व्यावहारिक लाभ हैं, पता नहीं था।”

पंचमी की दोपहर प्रतिमा एक छोटे ट्रक में आई। बड़े मामा को यह स्वीकार नहीं था। “हमारे समय बैलगाड़ी में आती थी।” छोटे मामा बोले, “समय बदल गया।” “अगले साल app cab?” “दादा, परिवहन के नवाचार पर देवी को आपत्ति नहीं है।” “तुम उनकी अधिकृत प्रतिनिधि हो?” दस लोग प्रतिमा उतार रहे थे और पच्चीस लोग निर्देश दे रहे थे। “दाएँ!” “नहीं, बाएँ!” “धीरे!” “बाँस पकड़ो!” “मुकुट संभालो!” बड़े मामा देख रहे थे। बोले, “लोकतंत्र की सही तस्वीर। काम करने वाले चुप हैं, काम न करने वाले आदेश दे रहे हैं।” आख़िर प्रतिमा ठाकुर-दालान में विराजी—एकचाला, बीच में शांत मुख वाली दुर्गा, पास लक्ष्मी और सरस्वती, कार्तिक के चेहरे पर अनावश्यक आत्मविश्वास, गणेश सदा की तरह निश्चिंत, सिंह बिना कारण क्रोधित और महिषासुर के चेहरे पर वही अनंत आश्चर्य—फिर वही गलती! बड़े मामा देर तक प्रतिमा देखते रहे। फिर बोले, “हर साल माँ का चेहरा नया लगता है।” छोटे मामा बोले, “कारीगर बदल गया।” बड़े मामा ने सिर हिलाया। “वह नहीं। जिसे प्यार करते हो, लौटने पर उसका चेहरा हर बार नया लगता है। यही relationship technology है।”

षष्ठी की शाम बोधन से ठीक पहले पहली असली समस्या आई—माइक बंद। सांस्कृतिक समिति का लड़का दौड़कर आया। “काकू, amplifier गया।” छोटे मामा ने माथा पकड़ा। “अब?” बड़े मामा बोले, “बंगाली दो हज़ार साल माइक के बिना जी चुके हैं।” छोटे मामा बोले, “तुम्हारे साथ काम नहीं हो सकता।” बड़े मामा बोले, “काम तो हो रहा है। माइक ठीक होने तक लोग अपनी आवाज़ का इस्तेमाल करेंगे।” अंत में स्कूल से पुराना माइक आया। बोधन हुआ। रोशनी जली। आँगन में धूप की गंध फैली। तालाब में रोशनी का प्रतिबिंब पड़ा। जो घर साल भर थोड़ा टूटा, थोड़ा खाली, थोड़ा बूढ़ा लगता था, वह अचानक गर्व से सीधा खड़ा दिखाई दिया। बड़े मामा बोले, “घर के भी पूजा के कपड़े होते हैं।” मैंने पूछा, “कहाँ?” उन्होंने चारों ओर देखा। “रोशनी।”

सप्तमी की भोर से रसोई युद्धक्षेत्र बन गई। भोग—खिचड़ी, लाबड़ा, आलू भजा, बेगुनी, टमाटर की चटनी, पायेश। छोटे मामा ने चार सौ लोगों का हिसाब किया था। बड़े मामा बोले, “पाँच सौ का बनाओ।” “क्यों?” “पूजा के भोग में आदमी गिनना पाप है।” “पाप नहीं, planning है।” “खाने आने वाले आदमी को संख्या मत बनाओ।” छोटे मामा बोले, “खाना बचा तो?” बड़े मामा ने कहा, “हांडी में थोड़ा बचना अच्छा है। सभ्यता का मतलब है आख़िरी आदमी के लिए भी कुछ बचा हो।” आख़िर चार सौ अट्ठानवे लोगों ने खाया। छोटे मामा परोसने की जगह खड़े सिर हिला रहे थे। “दो कम।” बड़े मामा बोले, “अगले साल आएँगे।”

भोग परोसने का बड़े मामा का तरीका खतरनाक था। कोई कहता, “लाबड़ा और नहीं।” वे कहते, “अपने मन से पूछिए।” कोई कहता, “पेट भर गया।” “पेट बड़ा स्वार्थी अंग है। उस पर भरोसा मत कीजिए।” और एक चम्मच और डाल देते। माधवी पिशी, एक बूढ़ी विधवा जिनके दोनों बेटे बाहर रहते थे, कोने में बैठी थीं। बड़े मामा खुद पायेश लेकर उनके सामने बैठे। “कैसा है?” उन्होंने चखा। बोलीं, “तेरी माँ के हाथ जैसा नहीं।” बड़े मामा थोड़ी देर चुप रहे। “वह हाथ कहाँ मिलेगा, पिशी?” कुछ क्षण जैसे आसपास का शोर कम हो गया। फिर पिशी ने कटोरी आगे की। “फिर भी थोड़ा और दे।” बड़े मामा ने परोस दिया। बाद में मुझसे बोले, “लोग खाना नहीं खाते, स्मृति खाते हैं। इसलिए एक ही पकवान किसी को अच्छा लगता है, किसी को नहीं।”

अष्टमी की सुबह पूजा का सबसे सुंदर समय था। साफ़ धूप, सफ़ेद साड़ी पर लाल पाड़, धूप, शंख, ढाक। अंजलि के समय छोटे मामा आगे खड़े आदेश दे रहे थे—“फूल लें, बेलपत्र लें, लाइन रखें।” बड़े मामा बोले, “देवी को देखने आए लोगों को queue management सिखा रहे हो?” छोटे मामा बोले, “अनुशासन ज़रूरी है।” बड़े मामा बोले, “भक्ति और अनुशासन को थोड़ा दूर रखो। बहुत पास लाओगे तो ऑफिस बन जाएगा।”

अष्टमी की शाम धुनुची नाच था। छोटे मामा ने पहले मना कर दिया—घुटनों में दर्द है। बड़े मामा बोले, “साहस की कमी को घुटने के पीछे मत छुपाओ।” बस, इतना ही काफ़ी था। पाँच मिनट में छोटे मामा धोती समेटकर आँगन में उतर गए। पहले एक धुनुची। फिर किसी ने दोनों हाथों में दो दे दी। ढाक तेज़ हुआ। छोटे मामा नाच रहे थे। चश्मे पर धुआँ जमा, कुछ दिखाई नहीं दे रहा। बड़े मामा बाहर से चिल्लाए, “चलते रहो! जीवन भी ऐसा है—आगे कुछ दिखाई नहीं देता, फिर भी नाचना पड़ता है!” छोटे मामा हाँफते हुए रुके। “तुम आओ!” बड़े मामा बोले, “मैं दार्शनिक हूँ। दार्शनिक नाचते नहीं, दूसरों के नाच की व्याख्या करते हैं।” गाँव के लड़कों ने उन्हें पकड़कर उतार दिया। सबको लगा अब हास्य होगा। लेकिन बड़े मामा ने धुनुची हाथ में ली और बहुत शांत, बहुत सुंदर, लगभग गंभीर नृत्य किया। केवल दो मिनट। सफ़ेद बाल, धोती, धुआँ और दीपक की रोशनी ढाक की लय में एक हो गए। समाप्त करके बोले, “शरीर को याद था। आदमी जिस चीज़ से सचमुच प्रेम करता है, शरीर उसे नहीं भूलता।”

नवमी की रात सांस्कृतिक कार्यक्रम था। बच्चों का नृत्य, कविता, गीत, एक छोटा नाटक, पुराने लोकगीत और अंत में बड़ों की हास्य प्रस्तुति। बड़े मामा निर्देशक थे। अध्यक्ष के भाषण के सामने उन्होंने लिखा था—“अधिकतम पाँच मिनट।” अध्यक्ष नाराज़। “क्या मेरे पास कहने को कुछ नहीं?” बड़े मामा बोले, “है। लेकिन श्रोताओं के भी घर हैं।” छह साल की तितली कविता सुनाने मंच पर गई और सब भूल गई। आँखों में आँसू। बड़े मामा मंच के किनारे आए। “भूल गई?” तितली ने सिर हिलाया। “बहुत अच्छा।” वह हैरान। “अब जो याद है, वही बोलो।” कुछ देर बाद तितली बोली, “मेरा नाम तितली है।” बड़े मामा ताली बजाने लगे। सबने ताली बजाई। तितली हँस पड़ी। और कुछ ही क्षण बाद उसे कविता भी याद आ गई। लौटते समय छोटे मामा बोले, “तुमने उसे अच्छा संभाला।” बड़े मामा बोले, “बच्चों को संभालना नहीं पड़ता। बड़ों को पड़ता है। बच्चों को सिर्फ़ यह समझाना होता है कि गलती से दुनिया खत्म नहीं होती।”

उसी रात एक और घटना हुई। गाँव के दूसरे छोर पर रहने वाले मिथुन के परिवार से रायबाड़ी का पच्चीस साल पुराना झगड़ा था—ज़मीन की सीमा को लेकर। मिथुन के पिता पूजा में कभी नहीं आते। नवमी की रात अचानक तेज़ बारिश हुई। पंडाल की तरफ़ पानी घुसने लगा। सब लोग बालू की बोरियाँ, बाँस, तिरपाल लेकर दौड़े। मैंने देखा मिथुन के पिता बिना छाते के आए और बाँस का एक सिरा पकड़ लिया। छोटे मामा एक पल के लिए रुक गए। बड़े मामा ने बस कहा, “उधर की तरफ़ पकड़िए।” उन्होंने पकड़ लिया। आधे घंटे में पानी उतर गया। किसी ने पुराने झगड़े की बात नहीं की। बड़े मामा ने बाद में मुझसे कहा, “झगड़ा कितना भी पुराना हो, पानी घुसता है तो सब एक ही दिशा में बाँस पकड़ते हैं। इसीलिए प्रकृति कभी-कभी मीटिंग बुलाती है।”

दशमी की सुबह रोशनी बदली हुई थी। वही धूप, फिर भी जैसे थोड़ी फीकी। बरण हुआ। सिंदूर खेला हुआ। महिलाएँ हँसते-हँसते रोईं। पुरुषों ने अभिनय किया कि उन्हें कुछ नहीं हुआ। छोटे मामा एक तरफ़ खड़े थे। बड़े मामा बोले, “मन खराब?” “नहीं।” “झूठ।” “अगले साल फिर आएँगी।” बड़े मामा बोले, “इसीलिए मन खराब करना सुरक्षित है। जो कभी लौटेगा ही नहीं, उसके लिए दुख अलग होता है।”

दोपहर बाद प्रतिमा निकली। गाँव की सड़क पर ट्रक, ढाक, नाचते लड़के, दरवाज़ों पर हाथ जोड़े बुज़ुर्ग। विसर्जन घाट पर बड़े मामा चुप खड़े थे। मैंने देखा उनकी आँखों में पानी है। पूछा, “रो रहे हो?” बोले, “धुआँ।” “यहाँ धुआँ नहीं है।” बोले, “तुम बहुत ज़्यादा निरीक्षण करने लगे हो।” लौटते समय छोटे मामा बोले, “सब खत्म।” बड़े मामा बोले, “बंगाली की पूजा दशमी में कभी खत्म नहीं होती। कल मेला है।”

दशहरा का मेला शिबतला के बड़े मैदान में लगा। नागरदोल, जलेबी, घुगनी, पापड़, खिलौना पिस्तौल, लकड़ी की बाँसुरी, मिट्टी के बर्तन, सस्ते गहने, गुड़िया, पुरानी किताबें, गुब्बारे और घरेलू सामान की ऐसी दुकानें जिनकी ज़रूरत आदमी को दुकान देखने से पहले पता ही नहीं होती। छोटे मामा ने लकड़ी के हाथी का दाम पूछा और बोले, “इतना?” बड़े मामा बोले, “मेले में बाज़ार भाव मत पूछो।” “क्यों?” “मेला अर्थशास्त्र के बाहर है। यहाँ आदमी ज़रूरत की चीज़ नहीं खरीदता, पसंद की चीज़ खरीदता है।” बड़े मामा ने दो लकड़ी की बाँसुरियाँ खरीदीं। एक मुझे दी, एक छोटे मामा को। छोटे मामा बोले, “मैं इसका क्या करूँगा?” बड़े मामा बोले, “छेद गिनना।”

मेले के आख़िर में हम तीनों मैदान के किनारे बैठ गए। दूर नागरदोल घूम रहा था। रोशनी में छोटे-छोटे चेहरे ऊपर-नीचे जा रहे थे। माइक पर पुराना बंगाली गीत। हवा में गरम जलेबी की गंध। बच्चे दौड़ रहे थे। छोटे मामा अचानक बोले, “इतना खर्च, इतनी मेहनत, चार दिन के लिए। लाभ क्या?” बड़े मामा कुछ देर चुप रहे। फिर पूछा, “बचपन में बाबा के साथ इस मेले में आए थे?” छोटे मामा बोले, “हाँ।” “याद है?” “है।” “बाबा हैं?” छोटे मामा चुप। बड़े मामा बोले, “जो चीज़ खत्म होने के चालीस साल बाद भी तुम्हारे साथ रहती है, क्या वह सच में खत्म हो गई?” छोटे मामा चुप रहे। बड़े मामा उँगलियाँ गिनने लगे। “एक बंद घर पाँच दिन खुला रहा। दिल्ली वाला भाई और कोलकाता वाला भाई एक कमरे में सोए। स्विमिंग पूल जानने वाले बच्चों ने तालाब में मछली देखी। माधवी पिशी ने अकेले खाना नहीं खाया। तितली कविता भूली और फिर शुरू करना सीखा। पच्चीस साल से झगड़ते दो परिवारों ने एक ही बाँस पकड़ा। तुम धुनुची लेकर नाचे और गिरे नहीं। इतने लाभ के लिए पाँच लाख ज़्यादा है?” छोटे मामा ने आदतन सुधार किया, “पाँच लाख तीन हज़ार सात सौ बीस।” बड़े मामा ने लंबी साँस ली। “इसीलिए तुम्हारे साथ दर्शन नहीं हो सकता।”

लौटते समय मेला लगभग खाली था। एक छोटा लड़का पिता का हाथ खींचते हुए रो रहा था—नागरदोल में एक बार और बैठेगा। बड़े मामा रुक गए। “उसे एक बार और बैठने दो।” छोटे मामा बोले, “बहुत रात हो गई।” बड़े मामा बोले, “उसे अभी नहीं पता अगले साल तक एक साल कितना लंबा होता है। बड़े लोग जानते हैं, इसलिए इंतज़ार कर सकते हैं। बच्चे नहीं जानते, इसलिए रोते हैं।” हम चुपचाप घर की ओर चले। रायबाड़ी लौटकर देखा ठाकुर-दालान खाली। अधिकतर रोशनी उतर चुकी थी। फ़र्श पर सूखे फूल। एक कोने में धुनुची। दो कुर्सियाँ उलटी रखी थीं। बरामदे में खाली थालियाँ। आदमी कम हो जाएँ तो घर बड़ा दिखता है।

छोटे मामा बोले, “कल से सब सामान्य।” बड़े मामा बोले, “सामान्य नाम की कोई चीज़ नहीं। जिस घर में पूजा हो गई, वह बाद में वही घर नहीं रहता।” छोटे मामा ने पूछा, “अगले साल की meeting कब?” बड़े मामा ने आकाश देखा। “देखा? माँ अभी कैलाश पहुँची भी नहीं और कमिटी फिर शुरू।” छोटे मामा बोले, “Planning ज़रूरी है।” बड़े मामा ने सिर हिलाया। “करो। लेकिन अगले साल भोग पाँच सौ पचास लोगों का बनाना।” “क्यों?” “इस साल चार सौ अट्ठानवे खाए।” “बाक़ी बावन कौन?” बड़े मामा मुस्कुराए। “पता नहीं।” फिर खाली ठाकुर-दालान की ओर देखकर बहुत धीरे बोले, “पूजा की असली सीख यही है। थोड़ी अतिरिक्त जगह हमेशा रखो—हांडी में, घर में और मन में। कौन कब आ जाए, कहा नहीं जा सकता।”

बरामदे के कोने में एक शिउली का फूल पड़ा था। छोटे मामा ने उसे उठाया और कुछ देर हथेली पर रखा। आश्चर्य की बात, उन्होंने कोई हिसाब नहीं किया। बड़े मामा भी कुछ नहीं बोले। दूर मेले की रोशनियाँ एक-एक कर बुझ रही थीं। तालाब के ऊपर चाँद चढ़ आया था। बाँसों में हवा चल रही थी। और कहीं से बहुत हल्की ढाक की आवाज़ आ रही थी—शायद सचमुच, शायद सिर्फ़ स्मृति में। पूजा समाप्त हो गई थी। और शायद ठीक इसी कारण लग रहा था, पूजा अभी समाप्त हुई ही नहीं।

प्रेरणा: संजीव चट्टोपाध्याय की ‘दुई मामा’ श्रृंखला।

 
 
 

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