
श्रीकांत की यात्रा
शिवराम चक्रवर्ती
देश-विदेश घूमना तुम सबको बहुत अच्छा लगता है। सभी बच्चों को अच्छा लगता है, है न? लेकिन हमारे श्रीकांत को यात्रा में कोई आनंद नहीं मिलता। उसके लिए यात्रा का मतलब है डेढ़ मन का बोझ ढोना।
उसके मामा बहुत कंजूस हैं। कहीं जाना हो तो मानो पूरा घर साथ ले चलना चाहते हैं। पता नहीं, परदेस में किस चीज़ की ज़रूरत पड़ जाए और फिर उसे पैसे खर्च करके खरीदना पड़े! लेकिन इसका सारा भार श्रीकांत पर आता है। इतना सामान गाड़ी में चढ़ाना श्रीकांत का काम, उतारना भी उसी का काम। स्टेशन पर कुली नाम के जीव भी मिलते हैं, यह बात श्रीकांत को देखते ही मामा बिल्कुल भूल जाते हैं।
केवल कुली का काम करके ही श्रीकांत को छुट्टी नहीं मिलती। पूरी यात्रा में डिब्बे के दरवाज़े पर खड़े होकर पहरा भी देना पड़ता है। मामा का विश्वास है कि दरवाज़े पर सिर निकालकर श्रीकांत डटकर खड़ा रहे तो कोई उस डिब्बे के पास नहीं आएगा। होता उलटा ही है। स्टेशन के जितने यात्री हैं, मानो उसी डिब्बे की ओर भागते हैं, चाहे अंदर जगह हो या नहीं; थोड़ी दूर खाली डिब्बा पड़ा हो तो भी किसी की नज़र नहीं जाती।
मामा को मेलगाड़ी पसंद नहीं, यदि पैसेंजर गाड़ी मिल जाए। उससे दो-चार पैसे बचते हैं। समय की कीमत ही क्या है? दो घंटे देर से पहुँचें, लेकिन कुछ पैसे बच जाएँ, तो वही बड़ी बात। पैसेंजर हर स्टेशन पर रुकती है—हर दो-तीन मिनट में। श्रीकांत ज़रा-सा बैठता नहीं कि फिर दरवाज़े पर खड़ा होना पड़ता है। रात में भी छुटकारा नहीं। मामा दिन-रात गाड़ी में घर जैसा आराम चाहते हैं। कोई अनचाहा आदमी आकर उन्हें जगा दे और बैठने के लिए जगह माँग ले, तो कैसा संकट आ पड़ेगा! इसीलिए श्रीकांत को आरक्षित डिब्बे की तख्ती की तरह दरवाज़े पर टँगे रहना पड़ता है।
इन सब कारणों से श्रीकांत को न यात्रा का सुख है, न शौक। पर न चाहने पर भी बहुत कुछ अपने-आप हो जाता है। भला खसरा कौन चाहता है? फिर भी हो जाता है। कौन विद्यार्थी परीक्षा में फेल होना चाहता है? फिर भी कोई न कोई फेल होता ही है। उसी प्रकार आज श्रीकांत को भी यात्रा पर निकलना पड़ रहा है।
घोड़ागाड़ी की छत पर जितना सामान रखा जा सकता था, उससे चार गुना लादा गया है। अंदर श्रीकांत, मामा, मामी और उनकी बेटी टेपी बैठे हैं। बाकी खाली जगहों में भी सामान भरा है—पानी का घड़ा, लालटेन, थैले, छतरियाँ, पानदान, खाने की टोकरी और न जाने कितनी छोटी-मोटी चीज़ें। कुछ की चिंता श्रीकांत को नहीं है। पानदान मामी सँभालेंगी, खाने की टोकरी मामा। मगर ऊपर रखी पेटियाँ, बिस्तर, सूटकेस और विशाल होल्डऑल अभी से उसकी गर्दन पर सवार जान पड़ते हैं।
सियालदह पहुँचते ही मामा सबसे पहले उतर पड़े। बोले, 'ज़रा पंखा देना! श्रीकांत, सब सामान उतार दे। ऐ गाड़ीवान, इसकी थोड़ी मदद कर देना। मैं टिकट लेकर आता हूँ।' गाड़ी रुकते ही कुछ कुली स्वयं सामान उतारने आ गए। मामा टिकट लेने चले ही थे कि उनकी यह बिना माँगी सहायता देखकर दौड़ पड़े। बोले, 'क्यों जी, तुम लोग हमारा सामान उतारोगे? बड़ी मेहरबानी होगी! क्या हमारे हाथ-पाँव नहीं हैं?'
एक कुली ने श्रीकांत की ओर सहानुभूति से देखा, 'इतना छोटा लड़का कैसे उठाएगा, बाबू?' मामा बोले, 'क्यों नहीं उठाएगा? उसकी उम्र में हम लोहा हज़म कर जाते थे! श्रीकांत, जल्दी सब नीचे रख। इन लोगों को छूने भी मत देना। चलो, हटो! क्या इसे अभी से हर काम कोई और करके देगा? खुद करना सीखना चाहिए।' मामा ने कुलियों को मक्खियों की तरह उड़ाना चाहा। वे तब भी नहीं हटे, तो चेतावनी दी, 'देखो, माल को हाथ मत लगाना। पहले ही कहे देता हूँ, एक पैसा नहीं मिलेगा।' कहकर वे टिकट लेने चल दिए।
श्रीकांत का मन हुआ कहे कि लोहा हज़म कर लेना भले संभव हो, लेकिन उसे ढोना दूसरी ही बात है। फिर सोचा, बहस से सामान का वजन तो कम नहीं होगा। इसलिए उसने धीरे-धीरे बक्से, बिस्तर, बर्तनों की गठरी, सूटकेस और पानी के भारी घड़े तक उतारकर प्लेटफॉर्म के एक किनारे ढेर कर दिए।
टिकट लेकर मामा दौड़ते आए। 'गाड़ी छूटने में बस आठ मिनट हैं! ज़रा-सा सामान है—डिब्बे तक ले जाने में कितने चक्कर लगेंगे? तीन? हर बार दो मिनट, कुल छह मिनट। दो मिनट बच भी जाएँगे। टेपी, तुम यहीं सामान की रखवाली करो और आखिरी चक्कर में श्रीकांत के साथ आना। मैं और तुम्हारी माँ आगे जाकर खाली डिब्बा देखते हैं। श्रीकांत, वह पेटी सिर पर रख, उसके ऊपर छोटा सूटकेस रख देता हूँ। उठा सकेगा न? बाईं बगल में बिस्तर, दाहिने हाथ में बड़ा सूटकेस और बाएँ हाथ से दोनों लालटेन लटका लेना। दूसरी बार बर्तनों की गठरी और मामी की पेटी ले आना। भागकर जाना, भागकर आना, नहीं तो गाड़ी छूट जाएगी। समझा? मैं चल रहा हूँ।'
मामा आगे निकल गए। थोड़ी दूर जाकर देखा, श्रीकांत पीछे नहीं आ रहा। लौटकर देखा तो वह बोझ तले चित्र की तरह स्थिर खड़ा है। 'क्यों रे, यहीं खड़ा है? गाड़ी छूटवाएगा क्या?' श्रीकांत बोला, 'चल ही नहीं पा रहा, मामा। बहुत भारी है। मैंने टेपी से कहा कि पीछे से धक्का देती रहे, तो शायद चल सकूँ।' टेपी ने तुरंत विरोध किया, 'पिताजी ने मुझे यहाँ सामान देखने को कहा है! मैं इसे धक्का देने जाऊँ और इस बीच सब चोरी हो जाए तो? इसे क्या, इसका बोझ तो कम हो जाएगा!' मामा बोले, 'हाँ, यह तो बड़ी मुश्किल हुई।'
एक कुली आगे आया। 'बच्चा इतना बोझ कैसे उठाएगा? गिराकर सब तुड़वा देगा, उधर ट्रेन भी निकल जाएगी।' मामा सोच में पड़ गए। सामान टूटे तो सीधा नुकसान, और समय भी नहीं। आख़िर मजबूरी में दो कुली करने पड़े। आधा घंटा पहले निकले होते तो यह खर्च न होता; श्रीकांत पाँच-छह बार में सब माल पहुँचा देता। मगर अब क्या उपाय था?
फिर देखने लायक जुलूस निकला। सबसे आगे दो कुली, दोनों के सिर पर बड़ी-बड़ी पेटियाँ। एक की बगल में बिस्तर, दूसरे के पास बर्तनों की गठरी। मामी के हाथ में पानी का घड़ा और टेपी के हाथ में पानदान। मामा के एक हाथ में छोटा बैग, दूसरे में ताड़ का पंखा। इतने से ही वे पसीने से परेशान थे और बीच-बीच में खुद को हवा कर रहे थे। सबसे पीछे श्रीकांत लगभग दोहरा होकर चल रहा था; एक और बड़ा संदूक उसी की गर्दन पर था। सचमुच अद्भुत शोभायात्रा थी!
डिब्बे में चढ़ते ही मामा पूरा बिस्तर फैलाकर लेट गए। इतनी कठिन मेहनत के बाद विश्राम जरूरी था। चलती ट्रेन की हवा लगते ही आँखें मूँदकर बोले, 'आह, अब जाकर ठंडक मिली! पूरी गाड़ी भरी है, लेकिन यह डिब्बा खाली मिल गया। शायद किसी की नज़र नहीं पड़ी।' दरअसल उनके सामान ने ही छोटे डिब्बे का लगभग सारा स्थान भर दिया था। कोने में बैठा श्रीकांत दर्द करती गर्दन सहला रहा था।
मामी ने पूछा, 'बहुत चोट लगी क्या?' श्रीकांत संकोच में हाथ हटाकर बोला, 'नहीं, मामी।' मामा बोले, 'वेट लिफ्टिंग बढ़िया व्यायाम है। इससे इसकी गर्दन मजबूत होगी। आगे चलकर पत्नी का बोझ जो उठाना है!' मामा ने 'पत्नी का बोझ' कहा या 'पुस्तकों का बोझ', ठीक-ठीक समझ में नहीं आया।
मामी बोलीं, 'हम तो कुछ दिनों के लिए शादी में जा रहे हैं। इतना सारा माल क्यों लाए? किस काम आएगा?' मामा का उत्तर था, 'जो चीज़ सँभालकर रखी जाती है, वही समय पर काम आती है। सब चीज़ों की जरूरत पड़ती है। जब जरूरत हो और चीज़ न मिले, तब परेशानी होती है।' मामी बोलीं, 'मदनपुर में गाड़ी मुश्किल से एक मिनट रुकती है। इतने सामान के साथ कैसे उतरेंगे? देखना, पेटियाँ सब गाड़ी में रह जाएँगी!' मामा ने आश्वासन दिया, 'चिंता मत करो। भाग्यवान का बोझ भगवान उठाते हैं।' इस वाक्य से श्रीकांत का दिल काँप उठा। मदनपुर में भगवान का काम करने वाला उसे अपने अलावा कोई दिखाई नहीं दिया। फिर सारा सामान उसी को उतारना होगा। उसके रोंगटे खड़े हो गए।
दमदम में कुछ साँवले एंग्लो-इंडियन युवक उसी डिब्बे में चढ़े। मामा और उनके सामान का फैलाव देखकर वे चकित रह गए। एक युवक टूटी-फूटी बँगला में बोला, 'बाबू, तुम लोग यहाँ क्यों? यह साहब लोगों का डिब्बा है। दरवाज़े पर नोटिस नहीं देखा? तुमको उतरना होगा।' आराम से बैठे मामा का पारा चढ़ गया। बोले, 'हम क्यों उतरें? हम भी तुम्हारी तरह पूरे यूरोपियन हैं। हमारी और तुम्हारी चमड़ी का रंग देखो—बिल्कुल एक!' युवकों ने कहा, 'अच्छा, देखते हैं कैसे नहीं उतरते!' अगले स्टेशन पर वे एक रेल-कर्मचारी को लेकर लौटे।
कर्मचारी ने भी उतरने का अनुरोध किया। मामा बोले, 'बाकी सभी डिब्बे भरे हैं, केवल यही खाली मिला। कहीं दूसरी जगह—चाहे ऊँची श्रेणी में ही सही—दिलवा दीजिए, हम अभी उतर जाते हैं।' कर्मचारी स्थान खोजने गया और फिर नहीं लौटा। युवक आपस में बड़बड़ाते रहे। श्रीकांत को डर था कि कहीं कर्मचारी सचमुच दूसरी जगह न खोज ले; तब फिर से सामान ढोना पड़ेगा। सौभाग्य से ट्रेन चल दी।
मामी ने कहा, 'अगले स्टेशन पर दूसरे डिब्बे में चलेंगे।' मामा बोले, 'कहाँ खाली जगह है?' 'न मिले तो अगली गाड़ी से चलेंगे।' 'पागल हो गई हो!' श्रीकांत भी बोल पड़ा, 'सभी गाड़ियाँ तो पराई हैं, मामी। अपनी गाड़ी कौन-सी है?' असल में वह दोबारा चढ़ने-उतरने से बचना चाहता था। मामी डर रही थीं कि साहबों के डिब्बे में बैठने पर पुलिस पकड़ न ले। मामा ने उन्हें चुप रहने को कहा, 'ये लोग बँगला समझते हैं। तुम्हारी घबराहट समझ गए तो और उछलेंगे।' मामी चुप हो गईं।
बैरकपुर में युवकों ने एक अंग्रेज रेल-अधिकारी को बुला लिया। उसने कहा, 'बाबू, यह डिब्बा यूरोपियन पोशाक वालों के लिए है। आपको उतरना होगा।' मामा तुरंत बोले, 'अरे साहब, यह बात पहले क्यों नहीं कही? हमारे पास भी साहबी कपड़े हैं। थोड़ा समय दीजिए, हम अभी साहब बन जाते हैं। अरे, संदूक की चाबी देना!' अधिकारी चले गए। मामा के पास कोई ऐसी पोशाक नहीं थी; वे सिर्फ चाल चल रहे थे। ट्रेन बैरकपुर से आगे बढ़ गई।
अब युवकों ने स्वयं इन्हें भगाने की ठानी। आपस में सलाह करके वे इतनी जोर-जोर से चिल्लाने लगे कि मामी डर से काँप उठीं। मामा भी कुछ घबराए। मामी ने धीरे से पूछा, 'ये कहीं काट तो नहीं खाएँगे?' मामा ने गंभीरता से सिर हिलाया, 'कौन जाने!' काटने की बात सुनकर टेपी पिता के विशाल शरीर के पीछे छिप गई।
तभी मामा के दिमाग में उपाय आया। बोले, 'श्रीकांत, तू कुत्ते की तरह भौंक सकता है?' 'बिल्ली की आवाज़ बहुत अच्छी निकालता हूँ मामा। निकालूँ? म्याऊँ—' 'नहीं, नहीं, बिल्ली नहीं। बीच-बीच में कुत्ते की तरह भौंक।' श्रीकांत ने 'भौं-भौं!' किया। मामा बोले, 'और जोर से!' श्रीकांत चिल्लाया, 'भौं! भौं! भौंऽऽ!' अचानक युवक शांत हो गए। एक ने पूछा, 'यह ऐसा क्यों भौंक रहा है?'
मामा ने गंभीरता से कहा, 'कोई बात नहीं, साहब। दस-बारह दिन पहले इसे एक पागल कुत्ते ने काट लिया था। हाइड्रोफोबिया—समझे?' युवक उछल पड़े, 'हाइड्रोफोबिया! पहले क्यों नहीं बताया? यह काट सकता है क्या?' मामा ने उन्हें भरोसा दिया, 'नहीं, नहीं, काटेगा नहीं। डरिए मत।' इतने में नैहाटी आ गया। युवक उसी क्षण हड़बड़ाकर डिब्बे से भाग गए। मामा ने चैन की साँस ली, 'चलो, बचे!'
लेकिन तभी एक और युवा एंग्लो-इंडियन चढ़ आया। उसने कोई आपत्ति न की। जासूसी उपन्यास निकालकर पढ़ने लगा। अचानक श्रीकांत के भौंकने पर चौंककर उसने बिल्कुल साफ बँगला में पूछा, 'लड़के को क्या हुआ?' मामा ने भी बँगला में उत्तर दिया, 'कुछ नहीं, जलातंक—जिसे तुम हाइड्रोफोबिया कहते हो।' 'ओह, सच? इससे तो इसका भला होगा,' युवक ने निश्चिंत भाव से कहा और किताब पढ़ता रहा। उसकी बेफिक्री देखकर मामा बेचैन हो उठे।
मामा ने फिर चेताया, 'मैंने तुम्हें सावधान कर दिया है। अगर काट लिया तो? तब तुम्हें भी वही बीमारी हो सकती है।' युवक मुस्कराया, 'अरे नहीं! जो कुत्ता भौंकता है, वह काटता कहाँ है?' मामा ने हार मान ली और श्रीकांत ने भी भौंकना छोड़ दिया। खुद को कुत्ता कहलवाने का इतना गुस्सा था कि उसका मन सचमुच उस युवक को काट लेने का हुआ।
काँकड़ापाड़ा पर ट्रेन रुकते ही युवक ने प्लेटफॉर्म पर परिचितों को देखकर आवाज़ दी। पहले वाले युवक आ गए। उसे सुरक्षित देखकर पूछा, 'तुम यहाँ ठीक हो? यहाँ तो खतरनाक हाइड्रोफोबिया है!' युवक बोला, 'मैंने इसे ठीक कर दिया।' 'कैसे?' उसने मामा की चाल खोल दी। डिब्बे में आते समय उसने श्रीकांत को पानी पीते देख लिया था; सचमुच जलातंक होता तो वह पानी नहीं पी सकता था। श्रीकांत को मामा पर बड़ा क्रोध आया। मामा ने पहले यह बात क्यों नहीं बताई? तब वह पानी न पीता और उसके कुत्ता न बने रहने का रहस्य न खुलता!
वे युवक फिर डिब्बे में जम गए और साफ कह दिया कि अगले स्टेशन पर मामा को उतरना ही होगा। मामी ने घबराकर पूछा, 'अब क्या होगा?' मामा बोले, 'तुम चिंता मत करो। भगवान जो करते हैं, भले के लिए करते हैं।' श्रीकांत को अपना दुखता गला और गर्दन याद आए। उसने सिर हिलाकर देखा कि दर्द कितना कम हुआ है।
अगला स्टेशन आया तो मामा बोले, 'यहाँ नहीं, अगले जंक्शन पर बदलेंगे। यहाँ गाड़ी एक मिनट ही रुकती है, और हमारा इतना सामान!' युवकों ने कहा, 'नहीं, यहीं उतरना पड़ेगा।' कहकर वे सब मिलकर बक्सों, पेटियों, बिस्तरों और सूटकेसों को उतारने लगे। एक ने बर्तनों की गठरी उतारी। दूसरे ने पानी का घड़ा थमाया, 'लो, तुम्हारा पानी का पिचर!' मामी घड़े की दुर्दशा के भय से हाय-हाय करने लगीं। दो युवक मिलकर भारी संदूक उतार चुके थे। मामा ने उसके ऊपर का बड़ा होल्डऑल दिखाया; वह भी उतर गया।
मामा ने कहा, 'बेंच के नीचे वह पेटी भी है!' एक युवक ने उसे उतारकर कहा, 'लो, तुम्हारा तुरुंग!' मामा ने सुधारा, 'तुरुंग नहीं, तोरंग!' आखिर एक पढ़े-लिखे युवक ने छोटा हैंडबैग मामा के हाथ में दिया और कहा, 'गुडबाय, मिस्टर!'
मामा इतने समय से प्रसन्न होकर उनकी मेहनत देख रहे थे। स्टेशन का नाम पढ़ते ही खुशी से बोल उठे, 'अरे, यह तो मदनपुर है! हमें तो यहीं उतरना था! इसलिए गुडबाय, मिस्टरों—और थैंक यू!'







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