भंडारघर की छींक और अनुमति का नीला दरवाज़ा
- Development Connects

- 26 जुल॰
- 4 मिनट पठन
सारांश: नीरा को बोलने वाली छतरी मिलती है, वह जादुई संदूक में गिरती है और विचित्र सरकारी नियमों में फँसे नीले दरवाज़े के सामने साहस से खड़ी होती है।

जिस दिन मैंने उल्टो-पुल्टो-लोक की खोज की, उस दिन मुझे दादी का भंडारघर साफ करने की सज़ा दी गई थी। सुबह ठीक नौ बजे माँ ने इतने शांत स्वर में फैसला सुनाया, मानो वे ऐसी न्यायाधीश हों जिन्होंने मेरी सभी अपीलें पहले ही सुनकर खारिज कर दी हों।
“तुम छह दिनों से अपनी नीली गणित की कॉपी खोज रही हो,” माँ ने कहा। “शायद वह भंडारघर में तुम्हारी दूसरी सभी खोई हुई सभ्यताओं के साथ छिपी बैठी है।”
मैंने विरोध किया कि सभ्यताएँ आम तौर पर रेगिस्तान के नीचे दबी होती हैं, अचार के मर्तबानों के पीछे नहीं। माँ ने कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने केवल मेरे हाथ में एक झाड़ू पकड़ा दी। उसी क्षण बहस आधिकारिक रूप से समाप्त हो गई।
दादी के भंडारघर में पुराने कागज़ों, सूखी मिर्चों, पीतल साफ करने वाले चूर्ण और बहुत पहले खाई गई त्योहार की मिठाइयों की हल्की सुगंध मिली हुई थी। वहाँ तीन टूटी कुर्सियाँ, गाने के बदले खाँसने वाला एक हारमोनियम, लोहे के कोनों वाला परदादा का पुराना संदूक, दादी के अनुसार ऐतिहासिक महत्त्व रखने वाले मिठाई के उन्नीस खाली डिब्बे और अँधेरे कोने में टिकाई गई एक पुरानी लाल छतरी थी।
जैसे ही मैंने छतरी को छुआ, उसने ज़ोर से छींक दी।
“अपनी उँगलियाँ सँभालकर,” उसने कहा।
डरकर मैंने छतरी गिरा दी।
फर्श पर पड़े-पड़े उसने कहा, “मेरी पसलियों का भी ध्यान रखना। हम आसानी से खुल जाते हैं, इसलिए लोग समझते हैं कि छतरियों की कोई भावनाएँ नहीं होतीं।”
मैंने आश्चर्य से कहा, “तुम बोल सकती हो!”
उसने उत्तर दिया, “और तुम आँखों के सामने दिखाई देने वाली बात फिर से बोल सकती हो। हम दोनों में अलग-अलग प्रतिभाएँ हैं।”
छतरी ने अपना नाम छतराम बताया। उसका दावा था कि वह कभी बादलों के राज्य का शाही मौसम सलाहकार था। बाद में उसने नौकरी छोड़ दी, क्योंकि बादल कभी उसकी सलाह नहीं मानते थे। उसके अनुसार, बिजली सरकारी ज्ञापन नहीं पढ़ती थी, बारिश बैठकों में देर से पहुँचती थी और हवा उपस्थिति रजिस्टर पर हस्ताक्षर करने से इनकार करती थी।
मैंने पूछा, “मेरी गणित की कॉपी कहाँ है?”
छतराम ने कहा, “मुझे कैसे पता होगा? मैं वर्षा का विशेषज्ञ हूँ, गुणा का नहीं।”
मैं उससे कुछ और पूछ पाती, उससे पहले परदादा के संदूक के भीतर से खटखटाने की आवाज़ आई।
ठक-ठक।
मैंने पूछा, “कौन है?”
भीतर से दबा हुआ स्वर आया, “अनुमति।”
“अनुमति कौन?”
“बाहर आने की अनुमति।”
संदूक का ढक्कन आधा इंच खुल गया। उस छोटे से खाली स्थान में से पीतल का चमकदार दरवाज़े का हत्था किसी संदेह से भरी आँख की तरह बाहर झाँका।
उसने पूछा, “क्या तुम नीरा सेन हो?”
मैंने कहा, “क्यों?”
“जब तक तुम यह निश्चित नहीं कर देती कि तुम नीरा सेन हो, मैं तुम्हें कारण नहीं बता सकता।”
“मैं नीरा सेन हूँ।”
“क्या तुम इसे प्रमाणित कर सकती हो?”
मैंने अपने विद्यालय का पहचान-पत्र दिखाया। हत्थे ने तस्वीर को इतनी गंभीरता से देखा, मानो वह किसी महत्त्वपूर्ण सरकारी मुकदमे का फैसला कर रहा हो।
“इस लड़की की दो चोटियाँ हैं।”
“मैंने पिछले महीने अपने बाल कटवा लिए।”
“तब तुम अब अपनी पहचान के समान नहीं रहीं।”
मैं बहस शुरू करती, उससे पहले संदूक ने बहुत बड़ी जम्हाई ली। छतराम, दरवाज़े का हत्था और मैं उसके किनारे के पार लुढ़ककर भीतर गिर गए।
हम एक लंबी सुरंग के रास्ते नीचे उतरने लगे। चारों ओर हवा में तैरते अल्पविराम, भागी हुई चप्पलें और रेलवे स्टेशन की घोषणाएँ करते चाय के चम्मच थे। एक बादल बिना कोई संकेत दिए बाईं ओर से हमें पार कर गया। एक निराश आलू पास से तैरते हुए बड़बड़ा रहा था कि उसने जीवन भर समोसा बनने का प्रशिक्षण लिया था, लेकिन उसे सब्ज़ी की तरकारी में नियुक्त कर दिया गया था। कुछ और नीचे, अदृश्य वाद्ययंत्रों के एक दल ने आधी धुन बजाई और अचानक भूल गया कि उसने बजाना शुरू ही क्यों किया था।
अन्त में हम सरसों के खेत के बीच खड़े एक विशाल नीले दरवाज़े के सामने जा गिरे। चारों ओर पीले फूलों की लहरें थीं। उनके ऊपर मधुमक्खियाँ भिनभिना रही थीं और दूर आकाश में सफेद बादल धीमी गति से चलती नावों जैसे दिखाई दे रहे थे।
फिर भी उस दरवाज़े के आसपास न कोई दीवार थी, न मकान और न वहाँ खड़े होने का कोई तर्कसंगत कारण। उसका नीला रंग कई स्थानों से उखड़ गया था और नीचे की पुरानी लकड़ी दिखाई दे रही थी। लेकिन पीतल का हत्था ऐसे चमक रहा था, मानो कोई प्रतिदिन चुपके से आकर उसे साफ करता हो।
दरवाज़े पर एक रंगीन पट्टिका टँगी थी—
उल्टो-पुल्टो-लोक में प्रवेश का विभागउन सभी दिनों में खुला, जिनका नाम “वार” पर समाप्त नहीं होता
दरवाज़े के पास एक मेज़ के पीछे सफेद कोट पहने एक नेवला बैठा था। उसका चश्मा लाल धागे से उसके कानों के साथ बँधा था। मेज़ पर इतने अधिक फॉर्म जमा थे कि उसकी नाक और सरकारी मुहर के अलावा कुछ भी साफ दिखाई नहीं देता था।
उसने पूछा, “यात्रा का उद्देश्य?”
मैंने कहा, “दुर्घटनावश गिरना।”
नेवले ने उत्तर दिया, “दुर्घटनावश गिरने की कोई श्रेणी नहीं है। हमारे पास जान-बूझकर गिरना, औपचारिक रूप से गिरना और कृषि-उद्देश्य से गिरना उपलब्ध है।”
“यदि मैंने गलत श्रेणी चुन ली तो क्या होगा?”
“आपको दूसरी कतार में पदोन्नत कर दिया जाएगा।”
मेज़ के सामने सात कतारें थीं। लेकिन उनमें कोई खड़ा नहीं था, क्योंकि हर कतार शुरू होने की अनुमति की प्रतीक्षा कर रही थी।
नेवले ने अपना परिचय सहायक उप-अस्थायी दरवाज़ा निरीक्षक मंगलदास के रूप में दिया। उसने मुझे 99-यू फॉर्म दिया। वह अनुमति माँगने के लिए आवेदन करने की अनुमति माँगने वाला आवेदन-पत्र था।
उसने कहा, “अपनी छाया की दो प्रतियाँ संलग्न कीजिए।”
मैंने कहा, “मेरी छाया मेरे साथ ही जुड़ी हुई है।”
“तब उसे अलग कीजिए।”
“यदि मैं ऐसा न कर सकूँ?”
“तब यह बताते हुए एक घोषणा-पत्र जमा कीजिए कि संलग्न की जाने वाली वस्तु को अलग न कर पाने के विषय में स्पष्टीकरण जमा करने में आप क्यों असफल रहीं।”
छतराम मेरे कान के पास झुका और फुसफुसाया, “आज का मौसम विद्रोह के लिए बहुत अच्छा है।”






टिप्पणियां